
संवाददाता
नई दिल्ली। कांग्रेस नेतृत्व इन दिनों राज्य सभा के समीकरण साधने में लगा है. कांग्रेस नेतृत्व को न सिर्फ राज्यसभा जाने वाले दावेदारों की नाराजगी का डर है बल्कि क्षेत्रीय नेताओं से मिलने वाली चुनौती भी परेशान कर रही है. क्षेत्रीय नेता अपने चहेतों को उच्च सदन भेजना चाहते हैं तो नेतृत्व अपने खास लोगों को, कहीं क्षेत्रवाद का डर है तो कहीं राज्य और केंद्र नेतृत्व के बीच टक्कर दिख रही है.
सबसे पहले बात करते हैं तेलंगाना की…तेलंगाना से कांग्रेस दो सीटें जीत सकती है. माना जा रहा है कि उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रहे बी सुदर्शन रेड्डी से कांग्रेस अपना किया हुआ वादा पूरा कर सकती है, तो वहीं एक सीट के लिए अभिषेक मनु सिंघवी का रिपीट होना तय है. हालांकि, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की स्थानीय सियासत के चलते आंध्र से आने वाले रेड्डी को तेलंगाना से भेजने पर पार्टी के भीतर राज्य इकाई में जबरदस्त विरोध है.रेवंत रेड्डी ने आंध्र और तेलंगाना की राजनीति में दोनों राज्यों के बीच टक्कर को देखते हुए नेतृत्व से स्थानीय को ही भेजने की अपील की है.ऐसे में वहां से किसी अल्पसंख्यक को टिकट मिल सकता है.
उसके बाद हरियाणा भी पार्टी के लिए मुश्किल का सबब बन रहा है. यहां से भी पार्टी एक सीट जीत सकती है. भूपेंद्र हुड्डा की पसंद नायक से नेता बने राजबब्बर और पूर्व अध्यक्ष उदयभान(दलित) हैं, तो वहीं आलाकमान ओबीसी के राष्ट्रीय चैयरमैन अनिल जयहिंद या फिर मीडिया विभाग से पवन खेड़ा या सुप्रिया श्रीनेत को भेजना चाहता है. हुड्डा अपनी बात मनवाने के लिए भरी दबाव बना रहे हैं.
सत्ता से बाहर होने के बाद इस बार पार्टी छत्तीसगढ़ से दो के बजाय एक सीट ही जीत सकती है. ऐसे में उसके सामने आदिवासी नेता फूलो देवी नेताम को रिपीट करने का ऑप्शन है, तो वहीं ओबीसी नेता भूपेश बघेल और पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंह देव की भी इसी सीट पर नजर है. ऐसे में केटीएस तुलसी का रिपीट होना मुश्किल माना जा रहा है.
यहां पार्टी एक सीट जीतने की स्थिति में है. ऐसे में लोकसभा चुनाव हारे दो दिग्गज आनंद शर्मा और प्रतिभा सिंह प्रमुख दावेदार हैं. पिछली बार यहां से क्रॉस वोटिंग के चलते अभिषेक मनु सिंघवी चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बार बाहरी के बजाय स्थानीय नेता को तरजीह दी जा सकती है.
यहां से महाविकास अघाड़ी के शरद पवार, फौजिया खान और प्रियंका चतुर्वेदी, रजनी पाटिल का कार्यकाल खत्म हो रहा है. लेकिन एकजुट होकर विपक्ष एक सीट ही जीत सकता है. ऐसे में शरद पवार एनसीपी के विलय की बात साफ कर दें और वो जाना चाहें तो कांग्रेस उनको समर्थन दे देगी अन्यथा वो अपना उम्मीदवार उतारने पर जोर देगी. अगर ऐसी स्थिति आती है तो कांग्रेस रजनी पाटिल को रिपीट करना चाहेगी.
यहां पार्टी डीएमके की मदद से एक सीट जीत सकती है. लेकिन डीएमके और कांग्रेस के बीच तालमेल को लेकर तनाव चल रहा है. ऐसे में यहां से राहुल गांधी के करीबी प्रवीन चक्रवर्ती को पार्टी चाहती है, लेकिन विजय के साथ तालमेल की वकालत और स्टालिन सरकार को घेरने वाले चक्रवर्ती को स्टालिन कतई पसंद नहीं करते. ऐसे में पवन खेड़ा या सुदर्शन रेड्डी की यहां से लाटरी लग सकती है.
यहां से अगर पूरा विपक्ष एकजुट हो और उसे ओवैसी की पार्टी का भी साथ मिले तो वो एक सीट जीत सकता है. लेकिन विपक्ष को डर है कि अपनी ताकत और सत्ता के दम पर एक सीट भी उसका जीतना मुश्किल हो जाएगा. वहीं महज एक सीट के लिए जिस ओवैसी को कांग्रेस बीजेपी की बी टीम करार देती रही उसे हाथ के साथ लेने का जोखिम लेना मुश्किल है.
यहां भी कमोबेश बिहार जैसी ही हालत है. कांग्रेस यहां बदरुद्दीन अजमल के साथ मिलकर एक सीट जीत सकती है. लेकिन चुनाव सिर पर हैं और वो अरसे से अजमल की पार्टी को बीजेपी की बी टीम और हिमंता की साथी बताती आई है. ऐसे में उसका साथ लेना उसे असहज करता है. वहीं हाल में पूर्व अध्यक्ष भूपेन वोरा के बीजेपी में शामिल होने के बाद उसे खुद क्रॉस वोटिंग का डर सता रहा है.
यहां कांग्रेस और नवीन पटनायक मिलकर एक सीट जीत सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक, दून स्कूल के पटनायक के साथी कमलनाथ इस बावत पटनायक को मना भी सकते हैं. लेकिन कांग्रेस और पटनायक के साथ आने पर बीजेपी को दोनों को घेरने का मौका मिलेगा, वहीं कांग्रेस और बीजेडी में मुख्य विपक्षी दल कौन की लड़ाई कमजोर होगी.
मतलब संसद के उच्च सदन में 5 सांसदों के चुने जाने से न सिर्फ पार्टी की स्थिति मजबूत होगी बल्कि विपक्ष की आवाज को भी ताकत मिलेगी लेकिन जिस तरफ से नेताओं में लट्ठमलट्ठ मची हुई है, कांग्रेस नेतृत्व के लिए मुश्किल का सबब बन गया है.



