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डॉक्टरों की भारी कमी से जूझ रहा देश का प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान दिल्ली एम्स, देखें पूरी डिटेल्स

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों की कमी का दावा किया.

संवाददाता

नई दिल्ली। दिल्ली एम्स में मैन पावर की कमी के कारण कई सारी चिकित्सा सेवाएं प्रभावित हो रही है. देश के कोने-कोने से इलाज के लिए आने वाले मरीजों का एम्स अपनी पूरी क्षमता के साथ इलाज नहीं कर पा रहा है. दिल्ली एम्स में सबसे बड़ी कमी डॉक्टरों को लेकर सामने आई है. स्वास्थ्य मंत्रालय की संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है.

दरअसल, समिति की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली एम्स में डॉक्टरों की कमी के कारण 20 प्रतिशत बेड, करीब एक चौथाई ऑपरेशन थिएटर (OT) और 18.70 फीसदी आईसीयू बेड इस्तेमाल नहीं हो पा रहे हैं. इसके लिए एम्स प्रशासन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. क्योंकि पिछले दो तीन सालों में एम्स से कई बड़े डॉक्टर भी छोड़कर चले गए, जिसका कारण एम्स निदेशक के कुछ प्रशासनिक फैसलों से उन वरिष्ठ डॉक्टरों का असहमत होना रहा. हालांकि, एम्स निदेशक ने कई ऐसे भी निर्णय लिए हैं जिनसे मरीजों को लाभ भी हुआ है.

समिति की रिपोर्ट के अनुसार, एम्स के कुल 4178 बेड में 3335 बेड का इलाज में इस्तेमाल हो रहा है. कुल 112 बड़े ऑपरेशन थियेटर और 44 माइनर ओटी हैं. इसमें से 26 बड़े ओटी का इस्तेमाल नहीं हो रहा है. ट्रॉमा सेंटर में 10 ऑपरेशन थियेटर हैं, जिसमें से पांच मॉड्यूलर ओटी हाल में ही बनकर तैयार हुए हैं. जबकि, एम्स ट्रॉमा सेंटर में छह ओटी ही चल रहे हैं. इसी तरह कुल 433 आईसीयू बेड में 81 आईसीयू बेड उपयोग में नहीं है. इस पर समिति ने गंभीर चिंता जताते हुए सुधार करने की सिफारिश की है.

समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि एम्स के विभिन्न सर्जिकल विभागों में मरीजों की सर्जरी के लिए कुछ सप्ताह से लेकर महीनों तक की वेटिंग है. न्यूरोसर्जरी में सबसे अधिक 5 वर्ष तक की वेटिंग है. एम्स में डॉक्टरों और कर्मचारियों में कमी बढ़ रही है, जहां 34.6% फैकल्टी के पद खाली हैं. इसके अलावा, कम वेतन के कारण भी डॉक्टर निजी हॉस्पिटलों का रुख कर रहे हैं. साथ ही पुराने वार्डो का नवीनीकरण भी जारी है.

कमेटी ने की ये सिफारिश

रेजिडेंट डॉक्टरों ने बताया कि काम के दबाव में उन्हें लगातार 36 घंटे तक ड्यूटी करनी पड़ती है.
रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि उनसे 12 घंटे से अधिक और सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम न लिया जाए.
कमेटी ने बताया कि करीब 30% मौतें हृदय रोगों से होती हैं, इसलिए हार्ट और न्यूरो संबंधी इलाज की सुविधाएं बढ़ाने की जरूरत है.
आउटबॉर्न एनआईसीयू सेवाओं के विस्तार की सिफारिश भी समिति की रिपोर्ट में की गई है.

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