
संवाददाता
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक तेल बाजार में मची उथल-पुथल का सीधा असर अब आम यात्रियों की जेब पर पड़ने लगा है. भारत की प्रमुख एयरलाइनों—एयर इंडिया, इंडिगो और आकासा एयर—ने विमान ईंधन (ATF) की बढ़ती कीमतों और परिचालन लागत को देखते हुए ‘फ्यूल सरचार्ज’ (ईंधन अधिभार) को फिर से लागू कर दिया है. विमानन विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले दिनों में हवाई किरायों में 20% तक की भारी वृद्धि देखने को मिल सकती है.
ईंधन और युद्ध का दोहरा वार
विमानन क्षेत्र के लिए ईंधन सबसे बड़ा खर्च होता है, जो कुल परिचालन लागत का लगभग 25% से 40% हिस्सा होता है. वर्तमान में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी संघर्ष ने तेल आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है. विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के पास तेल टैंकरों पर हुए हमलों ने कच्चे तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता पैदा कर दी है.
इसके अलावा, सुरक्षा कारणों से एयरलाइनों को पश्चिम एशिया के हवाई क्षेत्र का उपयोग करने से बचना पड़ रहा है. रूट बदलने के कारण उड़ानों की दूरी बढ़ गई है, जिससे ईंधन की खपत, चालक दल (Crew) के खर्च और तकनीकी ठहराव की लागत में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है.
यात्रियों पर प्रभाव
विमानन विशेषज्ञ संजय लाजर के अनुसार, एयरलाइनों के पास इन बढ़ती लागतों को झेलने की बहुत कम गुंजाइश है. उन्होंने कहा, “इनपुट लागत बहुत बढ़ गई है. रूट लंबे होने, उड़ान का समय बढ़ने और बीमा प्रीमियम में वृद्धि के कारण वास्तविक किराए में 20% तक की बढ़ोतरी होने की संभावना है.”
वहीं, अंजनी धानुका ने इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पर चिंता जताई है. उन्होंने बताया कि यूरोप जैसे रूटों पर एक व्यक्ति के टिकट में ₹12,000–13,000 की वृद्धि हो सकती है. “एक चार सदस्यों के परिवार के लिए यह लगभग ₹50,000 का अतिरिक्त बोझ है. इससे विदेशी पर्यटन और छात्रों की यात्रा पर बुरा असर पड़ेगा.”
DGCA के नए नियम: राहत या बोझ?
एक तरफ जहाँ किराए बढ़ रहे हैं, वहीं नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने यात्री-केंद्रित नए नियम जारी किए हैं. इनमें 60% सीटों को मुफ्त आवंटित करना और एक ही PNR वाले यात्रियों को साथ बिठाना शामिल है. विशेषज्ञ अजय सहाय का मानना है कि ये नियम यात्रियों के लिए अच्छे हैं, लेकिन इनसे एयरलाइनों की लागत और बढ़ेगी, जिसे अंततः यात्रियों से ही वसूला जाएगा.
निष्कर्ष: क्या भविष्य में कम होंगे दाम?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक वैश्विक चलन है. कैथे पैसिफिक और थाई एयरवेज जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी फ्यूल सरचार्ज बढ़ा रही हैं. सबसे बड़ी चिंता यह है कि एक बार कीमतें बढ़ने के बाद, तेल के दाम गिरने पर भी एयरलाइनें अक्सर किराए कम नहीं करतीं.
फिलहाल, जो यात्री मजबूरी में यात्रा कर रहे हैं, उन्हें ये बढ़े हुए दाम चुकाने ही होंगे, लेकिन पर्यटन क्षेत्र में आने वाले समय में भारी गिरावट की आशंका जताई जा रही है.



