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नीतीश के बहाने बड़ा सवाल: सक्रिय राजनीति से संन्यास की परंपरा क्यों नहीं; भाजपा नेता ने छेड़ी नई बहस

संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में नेताओं की सक्रियता और उम्र की सीमा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय गोयल की हालिया टिप्पणी ने न केवल बिहार की राजनीति, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है. विजय गोयल ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने पर तंज कसते हुए जो सवाल उठाए हैं, उनके मायने सत्ता के शीर्ष से लेकर कार्यकर्ताओं के स्तर तक खंगाले जा रहे हैं.

नीतीश पर वार, परंपरा पर जोर

विजय गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है कि नीतीश कुमार का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अब वैसा नहीं रहा जैसा पहले हुआ करता था. उनके अनुसार, नीतीश राज्यसभा जाएं या न जाएं, इससे न तो उनके व्यक्तिगत राजनीतिक कद पर कोई बड़ा असर पड़ेगा और न ही देश या प्रदेश की राजनीति की दशा-दिशा बदलेगी. गोयल का यह बयान उस ‘हाय-तौबा’ पर कटाक्ष है जो पिछले कुछ दिनों से नीतीश कुमार की भविष्य की भूमिका को लेकर मीडिया और राजनीतिक हलकों में मची हुई है. हालांकि एक मार्च को नीतीश कुमार के जन्मदिन पर विजय गोयल ने उनके साथ अपनी तस्वीरे साझा करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दी थी. उन्होंने लिखा था बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जन्म एक मार्च 1951 को बिहार के बख्तियारपुर में हुआ था.

75 की दहलीज और सक्रिय राजनीति

राजनीतिक विश्लेषक जगदीश ममगाई पूर्व केंद्रीय मंत्री के इस प्रतिक्रिया पर कहते हैं, गोयल ने इस मुद्दे को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य देते हुए असल बहस की ओर ध्यान आकर्षित किया है. उन्होंने प्रस्ताव दिया कि क्या देश में 75 वर्ष की आयु के बाद सक्रिय राजनीति से स्वेच्छा से हटने की एक स्वस्थ परंपरा नहीं बननी चाहिए? उनके इस तर्क के पीछे दो प्रमुख कारण नजर आते हैं. पहला युवाओं को अवसर, ताकि नई पीढ़ी के नेताओं को नेतृत्व के लिए जगह मिल सके. दूसरा शांतिपूर्ण आकलन, वरिष्ठ नेता अपने लंबे कार्यकाल के कार्यों का शांतिपूर्वक और निष्पक्षता से मूल्यांकन कर सकें.

भाजपा के ‘अघोषित नियम’ की प्रतिध्वनि

विजय गोयल का यह बयान भाजपा के उस आंतरिक और अघोषित नियम की याद दिलाता है, जिसके तहत 75 वर्ष पार कर चुके नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में भेजने या सक्रिय सांगठनिक पदों से दूर रखने की चर्चा होती रही है. हालांकि, बिहार जैसे राज्य में जहां गठबंधन की राजनीति में नीतीश कुमार की भूमिका अपरिहार्य मानी जाती रही है, वहां गोयल का यह बयान जेडीयू और भाजपा के रिश्तों के बीच एक सूक्ष्म ‘पॉलिटिकल मैसेजिंग’ भी हो सकता है.

बता दें कि राजनीति में रिटायरमेंट हमेशा से एक विवादास्पद विषय रहा है. कई लोग इसे अनुभवी नेतृत्व की क्षति मानते हैं, तो कई इसे व्यवस्था में नए खून के संचार के लिए जरूरी समझते हैं. विजय गोयल की प्रतिक्रिया के मायने स्पष्ट हैं वे राजनीति को पदों की दौड़ से ऊपर उठाकर योगदान और स्वेच्छा की पटरी पर लाना चाहते हैं. नीतीश कुमार को केंद्र में रखकर दिया गया यह बयान असल में पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए एक आईना है कि कब रुकना है और कब नई पीढ़ी को बागडोर सौंपनी है, इसका निर्णय समय रहते लिया जाना चाहिए.

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