संवाददाता
नई दिल्ली । तृणमूल कांग्रेस ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है. इसमें पार्टी ने आरोप लगाया है कि बिना किसी नोटिस के ही 58 लाख से अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं. एक दिन पहले ही राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक जनसभा में कहा था कि वह इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगी. टीएमसी ने यह कदम उस बयान के बाद उठाया है.
टीएमसी का कहना है कि चुनाव आयोग ने बिना किसी नोटिस या पर्सनल सुनवाई के 58,20,898 नाम हटा दिए. याचिका टीएमसी नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने दायर की है. उन्होंने अपनी याचिका में कहा, “पश्चिम बंगाल में 16 दिसंबर, 2025 को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पब्लिश की गई थी, और बिना किसी नोटिस या पर्सनल सुनवाई के 58,20,898 नाम हटा दिए गए. 2025 के स्पेशल समरी रिवीजन के बाद 7,66,37,529 वोटर्स से ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में वोटर्स की संख्या घटकर 7,08,16,616 हो गई है. चुनाव आयोग का यह कदम 11.08.2023 को लिखित रूप में जारी वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए अपने ही विस्तृत SOP के खिलाफ है.”
डेरेक ने अपनी याचिका में कहा कि फाइनल वोटर लिस्ट 14 फरवरी को पब्लिश होने वाली है. याचिकाकर्ता को आशंका है कि इसके तुरंत बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा कर दी जाएगी.इसमें कहा गया है, “यह अन्याय का आखिरी काम है क्योंकि यह वोटर लिस्ट को उन सभी गलतियों और कमियों के साथ फ्रीज कर देगा जो प्रतिवादी नंबर एक (चुनाव आयोग) की जल्दबाजी और गैर-कानूनी कामों के कारण हुई हैं. इससे गलत तरीके से और अन्यायपूर्ण तरीके से वोट देने के अधिकार से वंचित किए गए वोटरों को बहाल करने के लिए सभी अपीलें और सुधार प्रक्रियाएं बेकार हो जाएंगी, जिसमें वैसे भी काफी समय लगेगा.”
उन्होंने याचिका में आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग फील्ड अधिकारियों को WhatsApp या मौखिक रूप से जरूरी निर्देश दे रहा है. इसके लिए वे लिखित नोटिफिकेशन, सर्कुलर या ऑर्डर जारी नहीं कर रहे हैं. याचिका के अनुसार, “पश्चिम बंगाल राज्य में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया शुरू होने के बाद से चुनाव आयोग ने 50 से अधिक मौकों पर बीएलओ, ईआरओ, एईआरओ और डीईओ को मौखिक निर्देश दिए हैं और इनका कोई लेखा-जोखा नहीं है, ये सभी आदेश अनौपचारिक हैं.”
याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान कानून के बाहर जाकर काम किया है और मनमाने तरीके अपनाए हैं. उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग मनमाने ढंग से, अपनी मर्ज़ी से या कानून के बाहर काम नहीं कर सकता, न ही वह कानूनी तौर पर तय प्रक्रियाओं की जगह एड-हॉक या अनौपचारिक तरीकों का इस्तेमाल कर सकता है.”



