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केरलम में 2.27% वोटिंग बढ़ना क्या सत्ता परिवर्तन का संकेत है ?

सुनील वर्मा

नई दिल्ली। दक्षिण भारत के केरलम और पुडुचेरी में उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई. केरलम की 140 सीटों पर 78.27 फीसदी मतदान रहा तो केंद्र शासिल प्रदेश पुडुचेरी की 30 सीटों पर 89.87 फीसदी मतदान रहा. पुडुचेरी के इतिहास में सबसे ज्यादा मतदान रहा तो केरलम में इतनी ज्यादा वोटिंग दूसरी बार हुई है.

केरलम के सियासी इतिहात में हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड सीएम पिनराई विजयन तोड़ने में कामयाब रहे हैं, लेकिन इस बार का वोटिंग पैटर्न उनके लिए सियासी टेंशन बढ़ा सकता है. हालांकि, यूडीएफ और एलडीएफ दोनों की सियासी धड़कने बढ़ी हुई हैं, लेकिन वोटिंग बढ़ने को दोनों गठबंधन अपने-अपने पक्ष में बता रहे हैं?

केरलम विधानसभा चुनाव में इस बार 78.27 फीसदी मतदान रहा जबकि 2021 के विधानसभा चुनाव में 76 फीसदी मतदान था. इस तरह वोटिंग पैटर्न देखें तो पिछले चुनाव की तुलना में सवा दो फीसदी मतदान ज्यादा रहा, लेकिन केरलम में सत्ता बरकरार रहने वाला ट्रेंड पलट गया है. राज्य में देखा गया है कि जब-जब चुनाव में वोटिंग बढ़ी है तो सत्ता बदली है.

केरलम में 2.27% वोटिंग बढ़ना क्या देता है?

केरलम विधानसभा चुनाव की 140 सीटों पर किस्मत आजमा रहे 883 उम्मीदवारों का भाग्य ईवीएम में कैद हो गया है. केरलम में लगभग 78.27 फीसदी मतदान रहा, जो पिछले 2021 चुनाव से 2.27 फीसदी मतदान ज्यादा है. केरलम के कुल 14 जिले में से दो जिलों में 80 फीसदी से ऊपर मतदान हुआ. राज्य में सबसे ज्यादा वोटिंग 81.32 फीसदी कोझिकोड में हुई औऱ सबसे कम 70.76 फीसदी मतदान पथनमथिट्टा में हुआ.

2021 के केरल विधानसभा चुनाव में वोटिंग देखें तो 76 फीसदी मतदान जबकि 2016 में 75.26 फीसदी मतदान रहा. इस तरह वोटिंग पैटर्न साफ है कि 2016 और 2021 चुनाव से ज्यादा मतदान है. लेकिन देखा गया है कि 2016 की तुलना में 2021 में मतदान घटा था और 2021 की तुलना में इस बार मतदान बढ़ा है. इस तरह से केरल में बढ़े 2.27 फीसदी मतदान किसी के लिए सियासी टेंशन बढ़ाने वाले तो किसी के सियासी गेम को खराब कर सकते हैं.

हालांकि, इस बार केरल में एसआईआर प्रक्रिया के बाद चुनाव हुए हैं. बहुत सारे ऐसे मतदाताओं के नाम कट गए हैं, जिनके नाम 2 जगहों पर या फिर उनका निधन हो चुका है. इस लिहाज से भी वोटिंग बढ़ने के अनुमान है, लेकिन राजनीतिक दल अपने-अपने लिहाज से अपने-अपने पक्ष में बता रहे हैं?

हालांकि, इस बार केरल में एसआईआर प्रक्रिया के बाद चुनाव हुए हैं. बहुत सारे ऐसे मतदाताओं के नाम कट गए हैं, जिनके नाम 2 जगहों पर या फिर उनका निधन हो चुका है. इस लिहाज से भी वोटिंग बढ़ने के अनुमान है, लेकिन राजनीतिक दल अपने-अपने लिहाज से अपने-अपने पक्ष में बता रहे हैं?

साल 1960 चुनाव में 68.80 फीसदी, 1965 में 72.40 फीसदी, 1967 में 75.30 फीसदी, 1970 में 73.50 फीसदी, 1977 में 79.20 फीसदी, 1980 में 75.80 फीसदी और 1982 में 73.50 फीसदी मतदान हुआ था. इसी तरह से 1987 में 74.60 फीसदी, 1991 में 73.30 फीसदी, 1996 में 70.80 फीसदी, 2001 में 72.30 फीसदी और 2006 में 74.60 फीसदी मतदान रहा.

वहीं, 2011 में 75.10 फीसदी, 2016 में 77.40 फीसदी और 2021 में 76 फीसदी मतदान रहा. इस बार के विधानसभा चुनाव में 78.27 फीसदी वोटिंग हुई है. ये आंकड़ा अभी और भी बढ़ सकता है, फाइनल आंकड़ा आने के बाद.

केरल में हर पांच साल के बाद सत्ता परिवर्तन की परंपरा 1980 से चल आ रही थी, जिसे पिछले चुनाव में एलडीएफ ने बदल दिया था. राज्य में 1980 के बाद से सत्ता पर हर पांच साल पर बदलती रही है. इस राजनीतिक दल या गठबंधन को लगातार दोबारा जीत नहीं मिली थी.एक तरह से हर पांच साल बाद सत्ता परिवर्तन होता रहा है.

कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और और एक बार लेफ्ट के अगुवाई वाले एलडीएफ सत्ता में आती रही, लेकिन 2021 में लेफ्ट ने इस परंपरा को खत्म कर दिया था और लगातार दूसरी बार सत्ता में आई थी. इस तरह से चुनाव वोटिंग पैटर्न भी देखें तो जब-जब वोटिंग बढ़ी है तो सत्ता बदली है और वोटिंग घटी है तो सत्ता में रहने वाली पार्टी अपनी सरकार को बचाए रखने में सफल हुई है.

केरल की सियासत में ढाई फीसदी वोट से सारे गेम ही बदल जाता है. इस समझने के लिए 15 साल के चुनावी पैटर्न को देखना चाहिए. 2011 के विधानसभा चुनाव में 75.10 फीसदी मतदान रहा था, जो 2006 की तुलना में एक फीसदी ज्यादा मतदान रहा. केरल में सत्ता बदल गई गई थी, लेफ्ट को बाहर हो गई थी और कांग्रेस वापसी की थी.

पांच साल बाद 2016 में केरल विधानसभा चुनाव हुए तो 77.40 फीसदी मतदान रहा, जो 2011 के चुनाव की तुलना में दो फीसदी वोट ज्यादा मतदान हुए थे. वोटिंग बढ़ने से सत्ता बदल गई. यूडीएफ को बाहर होना पड़ा और लेफ्ट की सत्ता में वापसी हुई. इसके बाद 2021 में विधानसभा चुनाव हुए तो 2016 की तुलना में सवा फीसदी वोट कम पड़े थे. 2016 में 77.40 फीसदी और 2021 में 76 फीसदी वोटिंग हुई थी. इस तरह वोटिंग कम होने का लाभ लेफ्ट को मिला और सत्ता में बनी रही थी. इस तरह लेफ्ट ने 40 साल के सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड बदल दिया था.

केरलम विधानसभा चुनाव में इस बार 78.27 फीसदी मतदान हुई है तो 2021 की तुलना में 2.27 फीसदी ज्यादा है. इस लिहाज से यह बढ़ा हुआ वोट चुनाव में राजनीतिक असर डाल सकता है. राज्य के 14 जिले में से दो जिलों में 80 फीसदी से ऊपर मतदान हुआ तो 10 जिलों में 70 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई है.

वोटिंग फीसदी के घटने-बढ़ने का सीधा-सीधा असर चुनाव के नतीजों पर भी पड़ता है. भारत के चुनावी इतिहास में आमतौर पर माना जाता है कि जब वोटिंग ज़्यादा होती है, तो जनता बदलाव (एंटी इंकम्बेंसी) चाहती है. लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता. चुनाव में देखा गया है कि कई बार अधिक मतदान का मतलब सरकार के प्रति समर्थन (प्रो इंकम्बेंसी) भी रहती है.

मतलब साफ है कि वोटर्स की ये सक्रियता किस दिशा में जाएगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी. एसआईआर के बाद पहली बार चुनाव हुए हैं. एसआईआर में तमाम वोट काटे गए हैं तो कुछ नए वोट जोड़े गए हैं. इस तरह फर्जी वोटर हटाए जाने की वजह से भी वोटिंग बढ़ने का कारण माना जा रहा है, लेकिन बिहार में जब-जब वोटिंग बढ़ी है तो सत्ता बदल जाती है. अब देखना है कि केरल में बढ़ी वोटिंग किसके लिए मुफीद होती है?

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