
संवाददाता

ममता दीदी के ईद पर दुआ मांगने से मुस्लिम बच्चों का पेट नहीं भरेगा
असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर के गठबंधन ने टीएमसी के मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने का बड़ा प्लेटफार्म खड़ा कर दिया है। मुस्लिमों को भी लगने लगा है कि इतने सालों में उन्हें टीएमसी से छल के अलावा कुछ नहीं मिला है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए ओवेसी ने कहा, बंगाल में आपका कल्याण इसलिए नहीं हो रहा है, क्योंकि आपका अपना कोई बोलने वाला नहीं है। हुमायूं कबीर को अपना ‘बड़ा भाई’ बताते हुए कहा कि यह गठबंधन केवल चुनाव के लिए नहीं, बल्कि बंगाल में एक स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व खड़ा करने के लिए है। ओवैसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा, “ममता दीदी ईद के मौके पर रेड रोड जाकर दुआ तो मांगती हैं, लेकिन क्या दुआ मांगने से बच्चों के पेट में खाना आ जाएगा? क्या इससे शिक्षा मिल जाएगी?” उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी ने मुसलमानों के वोट तो लिए, लेकिन जमीन पर उनके लिए कुछ नहीं किया।
बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस ने दशकों राज किया, पर हालात नहीं सुधरे
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 5 लाख ओबीसी सर्टिफिकेट रद्द होने के मुद्दे पर भी उन्होंने ममता सरकार को घेरा और इसे अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय बताया। वहीं, कांग्रेस और लेफ्ट को लपेटते हुए ओवैसी ने कहा कि इन पार्टियों ने दशकों तक बंगाल पर राज किया, लेकिन मुसलमानों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, ‘कांग्रेस और लेफ्ट खुद को धर्मनिरपेक्षता का अलंबरदार बताते हैं, लेकिन जब मुसलमानों के हक की बात आती है, तो ये पार्टियां मौन हो जाती हैं। ये वही लोग हैं जो भाजपा का डर दिखाकर आपको डराते हैं ताकि आप हमेशा इनके गुलाम बने रहें।’ ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम समाज अब ‘रजिया गुंडों में फंस गई’ वाली स्थिति में नहीं रहेगा। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिले, जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस और अब टीएमसी के गढ़ रहे हैं। यहीं पर ओवैसी और हुमायूं कबीर की जोड़ी ने ममता बनर्जी की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ओवैसी ने दावा किया कि उनके गठबंधन की जीत ही यह सुनिश्चित करेगी कि विधानसभा में मुसलमानों की आवाज मजबूती से गूंजे। उन्होंने मतदाताओं से अपील की कि वे इस बार ‘वोटिंग मशीन’ बनने के बजाय ‘किंगमेकर’ बनें।
मुस्लिम वोटों का बदलता समीकरण ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है और करीब 120 से अधिक विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है। पिछले डेढ़ दशक में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने इसी सामाजिक समीकरण के आधार पर अपनी सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार की। भाजपा के खिलाफ “धर्मनिरपेक्ष ढाल” और अल्पसंख्यकों की संरक्षक की छवि बनाकर ममता बनर्जी ने लगातार चुनावी लाभ उठाया। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले पहली बार यह सवाल गंभीरता से उठने लगा है कि क्या मुस्लिम मतदाताओं की भलाई के लिए टीएमसी सरकार ने क्या किया है? इसलिए इस बार मुस्लिम मतदाता विकल्प तलाशने में जुट गए हैं। यदि ऐसा हुआ, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान तृणमूल कांग्रेस को ही उठाना पड़ सकता है।
ओवैसी और हुमायूं कबीर बन रहे मुस्लिमों के लिए नए विकल्प
हाल के महीनों में AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी और बंगाल के नेता हुमायूं कबीर की सक्रियता ने तृणमूल कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है। दोनों नेता यह तर्क दे रहे हैं कि बंगाल में मुसलमानों का इस्तेमाल केवल “वोट बैंक” के रूप में हुआ है। उनका कहना है कि चुनाव के समय मुस्लिम समाज से समर्थन लिया जाता है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनके सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास पर अपेक्षित काम नहीं होता। यही कारण है कि वे “स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व” की जरूरत का मुद्दा उठा रहे हैं। ओवैसी लंबे समय से यह दावा करते रहे हैं कि मुस्लिम समाज को केवल प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व चाहिए। हुमायूं कबीर भी इसी तर्क को बंगाल के संदर्भ में आगे बढ़ा रहे हैं। यदि यह संदेश सीमावर्ती जिलों और मुस्लिम बहुल इलाकों में असर डालता है, तो तृणमूल कांग्रेस के लिए यह नई चुनौती बन सकती है।
इस बार मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटों के विभाजन लगभग तय
तृणमूल कांग्रेस की चुनावी सफलता का बड़ा आधार मुस्लिम वोट रहा है। 2011 में वाम मोर्चे को सत्ता से हटाने के बाद से ममता बनर्जी ने लगातार मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की। 2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में भी यही देखा गया कि जिन सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक थे, वहां तृणमूल कांग्रेस को बड़ा फायदा मिला। मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, बीरभूम, दिनाजपुर और नदिया जैसे जिलों में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण ने टीएमसी को मजबूत बढ़त दिलाई। लेकिन अब यदि इन्हीं इलाकों में वोटों का विभाजन तय होता नजर आने लगा है। मुस्लिम मतदाताओं के बदले हुए समीकरण विधानसभा चुनाव की पूरा गणित बदल सकते हैं। दरअसल, मुस्लिम राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल प्रतिनिधित्व का है। आलोचकों का कहना है कि बंगाल में मुस्लिम आबादी बड़ी होने के बावजूद उन्हें सरकारी नौकरियों, प्रशासनिक पदों और राजनीतिक नेतृत्व में पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं मिली है। विभिन्न रिपोर्टों में यह बात सामने आती रही है कि सरकारी सेवाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात से काफी कम है।
कांग्रेस और वाम दल भी टीएमसी के मुस्लिम वोट बैंक में करेंगे सेंधमारी
मुस्लिम वोटों के बंटवारे की संभावना केवल ओवैसी और कबीर तक सीमित नहीं है। कांग्रेस और वाम दल भी इस बार कुछ हिस्सों में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं। खासकर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में कांग्रेस की पारंपरिक पकड़ रही है। अधीर रंजन चौधरी जैसे नेताओं के दौर में कांग्रेस इन इलाकों में मजबूत रही थी। हालांकि पिछले कुछ चुनावों में टीएमसी ने यहां कांग्रेस की जमीन कमजोर की, लेकिन अब कांग्रेस फिर से मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी प्रासंगिकता साबित करने की कोशिश कर रही है। वाम दल भी यह तर्क दे रहे हैं कि टीएमसी ने केवल भय की राजनीति के आधार पर मुस्लिम वोट हासिल किए हैं। वामपंथी दल रोजगार, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को सामने रखकर अल्पसंख्यक मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर सकते हैं। यदि कांग्रेस, वाम दल और ओवैसी-कबीर अलग-अलग हिस्सों में थोड़े-थोड़े मुस्लिम वोट भी हासिल कर लेते हैं, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को होने वाला है।
मुस्लिमों की बदली सोच से ममता के लिए यह सबसे मुश्किल चुनाव
ममता बनर्जी की राजनीति का बड़ा आधार यह रहा है कि उन्होंने खुद को भाजपा की खिलाफत करने वाले नेता के रूप में स्थापित किया। मुस्लिम मतदाता भी लंबे समय तक यही मानते रहे कि भाजपा को रोकने के लिए टीएमसी ही प्रभावी विकल्प है। लेकिन अब पहली बार ऐसा लगता है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल भाजपा को रोकना ही पर्याप्त है, या फिर उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी पर भी ध्यान देना चाहिए। इसके लिए टीएमसी से ज्यादा जरूरी है कि उनके समुदाय का नेता उनका प्रतिनिधित्व करे। यह सकारात्मक सोच मजबूत होती है, तो ममता बनर्जी के लिए यह सबसे कठिन चुनाव साबित हो सकता है। क्योंकि भाजपा का वोट बैंक पहले से काफी हद तक स्थिर माना जाता है, जबकि टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत उसके अल्पसंख्यक समर्थक रहे हैं। ऐसे में यदि मुस्लिम वोटों में 5 से 10 प्रतिशत का भी बंटवारा होता है, तो कई सीटों पर इसका सीधा असर दिख सकता है। मुस्लिम वोटों के बंटवारे का सबसे ज्यादा असर सीमावर्ती जिलों में दिखाई देगा। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूम, नदिया और उत्तर 24 परगना जैसे इलाकों में मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है। यहां कई सीटें ऐसी हैं जहां जीत-हार का अंतर बहुत कम रहता है। यदि मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा टीएमसी के अलावा अन्य दलों में बंटता है, तो भाजपा को लाभ मिल सकता है।
ममता ने मुस्लिमों की जमीन पर मंदिर बनवाकर विश्वासघात किया- कबीर
एक ओर ओवैसी ने मुसलमानों को ‘वोटिंग मशीन’ बनाए जाने पर तीखा प्रहार कर रहे हैं, दूसरी ओर हुमांयू कबीर बाबरी मस्जिद के नाम पर मुस्लिमों को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोड़ रहे हैं। कबीर ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले अपनी ऐसी छवि बना ली ही है, जिसमें उन्होंने बाबरी मस्जिद को वरीयता देते हुए टीएमसी से सीधी लड़ाई ली है। बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर टीएमसी का साथ ना आने भी मुसलमानों को भावनात्मक रूप से काफी खल रहा है। हुमायूं कबीर ने भी ओवैसी का समर्थन करते हुए कहा कि ममता बनर्जी ने मुसलमानों की जमीन पर मंदिर बनवाकर और उनकी अनदेखी कर विश्वासघात किया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर ने गठबंधन का घोषणापत्र भी जारी किया। बता दें के दोनों का गठबंधन बंगाल की 180 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और उनका लक्ष्य केवल सीटें जीतना नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखना है। दोनों के इन तीखे तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में मुस्लिम वोट बैंक का बिखराव टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।
इधर मुस्लिम वोट बैंक छिन रहा, उधर SIR में लापरवाही से SC नाराज
एक और पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में सैंधमारी से ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर जिस तरह की अव्यवस्था, अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक शिथिलता लगातार सामने आ रही है, उसने ममता सरकार की नीयत और क्षमता दोनों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुस्लिम मतदाताओं को खुश करने के लिए ममता बनर्जी किस हद तक जा सकती हैं, यह इसी से साफ हो जाता है कि रामनवमी से पहले भगवान राम की मूर्ति का सिर काटकर ले जाने वाले जिहादियों पर भी वह अब तक मौन है और ना ही इस मामले में कोई गिरफ्तारी सामने आई है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन पहले ही मालदा जिले में SIR से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बनाए जाने की घटना पर सख्त नाराजगी जताते हुए सरकार को कड़ी डांट फटकार लगाई है। सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा है कि यह घटना सोची-समझी और भड़काऊ लगती है। इसका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना है।
बंगाल में कोर्ट से लेकर संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की अवमानना
दरअसल, हार की हताशा में पश्चिम बंगाल में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अदालत को “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” जैसी कठोर टिप्पणी करनी पड़ी। यह केवल SIR का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार भी है या नहीं। नाम कटने, फर्जी आपत्तियों, तकनीकी गड़बड़ियों, न्यायिक अधिकारियों को घेरने और प्रशासनिक अराजकता जैसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि राज्य सरकार संवैधानिक संस्थाओं की चेतावनियों को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। जब संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की लगातार अनदेखी होती है, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बन जाता है। ममता बनर्जी और उनकी सरकार हर बार राजनीतिक साजिश और विक्टिम कार्ड का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती दिखती हैं, जबकि सच्चाई यह है कि संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना धीरे-धीरे उनकी सरकार की कार्यशैली का स्थायी हिस्सा बनती जा रही है।
सात न्यायिक अधिकारियों का कई घंटे तक घेराव और नारेबाजी
सर्वोच्च अदालत में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था ढह गई है। बेंच ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों से उनकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा। दरअसल, 7 न्यायिक अधिकारी बुधवार को मालदा के बीडीओ ऑफिस पहुंचे थे। इनमें तीन महिलाएं थीं। तभी वोटर लिस्ट में कथित रूप से नाम कटने के विरोध में हजारों लोगों ने ऑफिस को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारी नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करते रहे। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।



