
संवाददाता
न्यूयार्क। युद्ध हमेशा सिर्फ मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की जान ही नहीं लेता बल्कि वह देश की अर्थव्यवस्था को भी खाली करता जाता है। बम-बारूद और मिसाइलों से जितना दुश्मन का नुकसान होता है उतना ही अपने देश के खजाने पर भी बोझ पड़ता है। मिडिल ईस्ट में इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध में भारी तबाही मची है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को ढेर कर दिया गया है और हजारों ईरानियों की जान चली गई है।
यह युद्ध जितना ईरान के लिए भारी है, उतना ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए भी। आँकलन बताते हैं कि हमले के पहले ही 24 घंटे में अमेरिका को करीब 779 मिलियन डॉलर (लगभग 6900 करोड़ रुपए) खर्च करने पड़े थे। जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है, अगर यह युद्ध एक महीने या उससे ज्यादा समय तक चलता है तो यह खर्च कई लाख करोड़ रुपए तक पहुँच सकता है।
युद्ध का पहला दिन ही पड़ा भारी
ईरान पर अमेरिकी हमले के पहले 24 घंटे ही इस बात का संकेत दे चुके हैं कि यह युद्ध अमेरिका के लिए कितना महँगा साबित होने वाला है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ शुरुआती सैन्य कार्रवाई में अमेरिका ने लगभग 779 मिलियन डॉलर खर्च कर दिए। इस खर्च में मिसाइल हमले, लड़ाकू विमानों की उड़ानें, सैन्य संसाधनों की तैनाती और युद्ध संचालन से जुड़ी अन्य गतिविधियाँ शामिल हैं।
इतना ही नहीं, इस हमले में अली खामेनेई और कई अन्य अहम सैन्य व राजनीतिक व्यक्तियों को निशाना बनाया गया औ इसके बाद पूरे मध्य-पूर्व में तनाव और तेजी से बढ़ गया है।
30 करोड़ की मिसाइल से गिरा रहा 30 लाख का ड्रोन
ईरान के सस्ते ड्रोन को मार गिराने के लिए अमेरिका को बेहद महँगी मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। सैन्य रिपोर्टों के मुताबिक, ईरानी ड्रोन को नष्ट करने के लिए अमेरिका ‘पैट्रिएट PAC-3 इंटरसेप्टर मिसाइल’ का सहारा ले रहा है जिसकी कीमत ड्रोन की तुलना में कई गुना ज्यादा है।
जानकारी के अनुसार, ईरान के हमलावर ड्रोन की कीमत करीब 35,000 डॉलर यानी लगभग 29 लाख रुपए के आसपास होती है। वहीं, इन ड्रोन को हवा में ही नष्ट करने के लिए इस्तेमाल की जा रही पैट्रिएट PAC-3 इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत करीब 3.7 मिलियन डॉलर यानी लगभग 30 से 31 करोड़ रुपए बताई जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि लगभग 30 लाख रुपये के ड्रोन को गिराने के लिए करीब 30 करोड़ रुपए की मिसाइल खर्च की जा रही है।
सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध की परिस्थितियों में ऐसा करना जरूरी हो जाता है। उनका तर्क है कि अगर इन ड्रोन को समय रहते नहीं रोका गया तो वे एयरबेस, तेल रिफाइनरी, बिजली संयंत्र या अन्य महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना सकते हैं।
विमानवाहक पोत चलाना भी महँगा
युद्ध में सबसे ज्यादा खर्च उन बड़े सैन्य प्लेटफॉर्म्स पर होता है जिन्हें युद्ध क्षेत्र में तैनात किया जाता है। जैसे अमेरिका का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत USS जेराल्ड रूडोल्फ फोर्ड। यह दुनिया का सबसे आधुनिक और शक्तिशाली कैरियर माना जाता है। लेकिन इसे चलाना बेहद महँगा है।
सुरक्षा अध्ययन संस्थान सेंटर फोर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (CNAS) के आँकड़ों के मुताबिक, एक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को चलाने में रोज करीब 6.5 मिलियन डॉलर (करीब 58 करोड़ रुपए) खर्च होते हैं। ईरान पर हमले से पहले अमेरिका ने मध्य-पूर्व में ऐसे दो विमानवाहक पोत समूह तैनात किए थे। इसका मतलब है कि सिर्फ इन जहाजों को ऑपरेट करने में ही रोजाना सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं।
युद्ध शुरू होने से पहले ही अरबों डॉलर झोंके गए
किसी भी युद्ध की असली लागत केवल उस दिन से शुरू नहीं होती जब पहली गोली चलती है। असली खर्च तो उससे पहले की सैन्य तैयारियों में होता है। ईरान पर हमले से पहले अमेरिका ने बड़े पैमाने पर सैन्य तैयारी की थी। इसमें लड़ाकू विमानों को विभिन्न सैन्य अड्डों पर तैनात करना, नौसेना के जहाजों को रणनीतिक स्थानों पर भेजना और मध्य-पूर्व में पहले से मौजूद संसाधनों को नए सिरे से व्यवस्थित करना शामिल था।
इन तैयारियों पर अनुमानित रूप से लगभग 630 मिलियन डॉलर यानी करीब 5556 करोड़ रुपए खर्च हुए। यानी युद्ध शुरू होने से पहले ही अमेरिका अरबों रुपए खर्च कर चुका था।
हर दिन ₹8300 करोड़ खर्च कर रहा अमेरिका
पत्रिका ‘द ऐटलांटिक’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी रक्षा विभाग ने युद्ध के खर्च को लेकर एक शुरुआती अनुमान तैयार किया था। इस अनुमान के मुताबिक अगर यह संघर्ष जारी रहता है तो अमेरिका को हर दिन लगभग 1 अरब डॉलर (करीब 8,300 करोड़ रुपए) खर्च करने पड़ सकते हैं। यानी सिर्फ एक दिन की लड़ाई में ही अमेरिका इतना पैसा खर्च कर रहा है जितना कई छोटे देशों का सालभर का बजट होता है।
इस खर्च में सैन्य अभियानों का संचालन, सैनिकों की तैनाती, लड़ाकू विमानों की उड़ान, मिसाइल और बमों का इस्तेमाल, खुफिया निगरानी और युद्ध से जुड़े अन्य सैन्य संसाधनों का खर्च शामिल होता है। अमेरिकी सेना की मध्य-पूर्व कमान (CENTCOM) और पेंटागन के आँकड़ों के आधार पर तैयार किए गए एक ट्रैकर के अनुसार, गुरुवार तक इस संघर्ष पर अमेरिका का कुल खर्च 5.7 अरब डॉलर (लगभग 47,000 करोड़ रुपए) से भी अधिक हो चुका था।
अगर युद्ध लंबा चला तो लागत कई गुना बढ़ेगी
अर्थशास्त्रियों और सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह युद्ध कुछ हफ्तों से ज्यादा चला तो अमेरिका के लिए इसकी आर्थिक कीमत बेहद भारी हो सकती है। पेन व्हार्टन बजट मॉडल के निदेशक और जाने-माने आर्थिक विश्लेषक केंट स्मेटर्स का अनुमान है कि अगर युद्ध लगभग एक महीने तक चलता है तो अमेरिका को करीब 210 बिलियन डॉलर यानी लगभग 18.87 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं।
यह रकम इतनी बड़ी है कि यह कई छोटे देशों की पूरी सालाना अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है। इसका मतलब यह है कि युद्ध केवल सैन्य मोर्चे पर ही नहीं बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
मिडिल ईस्ट में पहले से ही भारी खर्च कर रहा अमेरिका
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका पहले से ही मध्य-पूर्व में भारी सैन्य खर्च कर रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल पर हमला किया था तब से अमेरिका लगातार इजरायल को सैन्य सहायता दे रहा है। इस सहायता की कुल राशि लगभग 21.7 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुकी है।
इसके अलावा अमेरिका ने यमन, ईरान और मध्य-पूर्व के अन्य क्षेत्रों में चल रहे सैन्य अभियानों में भी भारी पैसा खर्च किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन अभियानों पर 9.65 से 12.07 बिलियन डॉलर तक खर्च हो चुके हैं। इस तरह कुल मिलाकर अमेरिका का खर्च 31 से 33 बिलियन डॉलर के बीच पहुँच चुका है।
हर दिन करोड़ों डॉलर खर्च सिर्फ सैनिक भेजने का
इंस्टीट्यूट फोर पॉलिसी स्टडीज (Institute for Policy Studies) के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका सिर्फ सैनिकों और सैन्य संसाधनों को मिडिल ईस्ट में भेजने और वहाँ बनाए रखने पर ही रोज करीब 59 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। यह आँकड़ा सिर्फ सैनिकों की आवाजाही और तैनाती का है।
इसमें मिसाइल, बम, युद्धक विमानों की उड़ानें और उपकरणों के नुकसान जैसे खर्च शामिल ही नहीं हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक अमेरिका के तीन लड़ाकू विमान भी नष्ट हो चुके हैं जिन्हें गलती से कुवैत के एयर डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया था।
बाद में सामने आता है युद्ध का असली खर्च
विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध की शुरुआती लागत अक्सर कम आँकी जाती है। 9/11 के बाद अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में जो युद्ध लड़े थे उनकी शुरुआती लागत का अनुमान बाद में कई गुना ज्यादा निकला। शुरुआत में कहा गया था कि इराक युद्ध पर करीब 50 बिलियन डॉलर खर्च होंगे लेकिन बाद में यह खर्च कई ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया।



