
संवाददाता
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी नेतृत्व पर यह आरोप बार-बार यूं ही नहीं लगता कि उसने सत्ता को बनाए रखने के लिए तुष्टिकरण की नीति को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में बार-बार अवरोध डालकर ममता बनर्जी सरकार ने इसे साबित भी कर दिखाया है। दरअसल, अवैध घुसपैठ और संदिग्ध मतदाता पंजीकरण को नजरअंदाज करना इसी रणनीति का हिस्सा रहा है, ताकि एक ऐसा वोट बैंक तैयार हो सके जो चुनावी जीत सुनिश्चित करे। यह केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता से जुड़ा गंभीर सवाल है। एसआईआर कोई साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि चुनावी शुचिता का मूल आधार है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची में केवल वही नाम रहें जो कानूनन इसके पात्र हैं। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की रुकावट, दबाव या पक्षपात लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ माना जाता है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर ममता सरकार को एसआईर के मामले में कड़ी फटकार लगाई है। सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा है कि इस मामले में किसी भी तरह की रुकावट बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में ऑब्ज़र्वरों को बदलने के लिए भी कहा है। यह निर्देश इस पूरे मामले को और गंभीर बना रहे हैं।
ममता बनर्जी की राजनीति पर हमेशा विवादों की परछाईं
ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा जनआंदोलन और सत्ता परिवर्तन की कहानी रही है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी सरकार लगातार विवादों में घिरी रही है। कभी उनकी सरकार में कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ती हैं तो कभी महिलाओं के शोषण के सहभागी तृणमूल कांग्रेस के नेता ही बनते हैं। कभी बाबरी मस्जिद पर चुप्पी, तुष्टिकरण की राजनीति तो कभी एसआईआर में अनावश्यक अवरोध पैदा करने के आरोप ममता सरकार पर लग रहे हैं। राजनीतिक दबाव, संस्थाओं की स्वायत्तता पर सवाल और चुनावी प्रक्रिया को लेकर संदेह के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। किसी भी लोकतंत्र में शासन का आधार तुष्टिकरण नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता है। जब सरकारें समुदायों को नागरिक के बजाय वोट बैंक के रूप में देखने लगती हैं, तब शासन का उद्देश्य भटक जाता है। जैसा कि अब पश्चिम बंगाल में आए दिन नजर आ रहा है।
एसआईआर में किसी भी तरह की रुकावट बर्दाश्त नहीं होगी
अदालत की फटकार इस बात की याद दिलाती है कि संविधान सभी नागरिकों को समान मानता है और किसी भी प्रकार की पक्षधरता उसके मूल ढांचे के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह स्पष्ट कहना कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में किसी भी तरह की रुकावट बर्दाश्त नहीं की जाएगी, केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं है। यह ममता बनर्जी की उसक शासन व्यवस्था के लिए सीधी चेतावनी है जो चुनावी लाभ के लिए प्रक्रियाओं से खिलवाड़ करने की कोशिश करती है। अदालत का यह रुख बताता है कि लोकतंत्र में सत्ता की कोई भी राजनीति संविधान से ऊपर नहीं हो सकती। सुनवाई के दौरान राजनीतिक बयानबाज़ी पर अदालत की असहिष्णुता यह दर्शाती है कि संवैधानिक मंच को राजनीतिक अखाड़ा नहीं बनने दिया जाएगा। तृणमूल सरकार के लिए यह संदेश स्पष्ट है कि अदालतें तर्क, तथ्य और कानून से चलती हैं, न कि चुनावी भाषणों से प्रभावित होती हैं।कोर्ट के ऑब्ज़र्वर बदलने के निर्देश: ममता पर अविश्वास का संकेत
बंगाल में ऑब्जर्वरों को बदलने का आदेश अपने आप में एक आरोप है। यह दर्शाता है कि अदालत को मौजूदा निगरानी तंत्र की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं रहा। किसी भी लोकतंत्र में यह स्थिति अत्यंत गंभीर मानी जाती है। यह राज्य सरकार के लिए महज प्रशासनिक झटका नहीं, बल्कि नैतिक विफलता का प्रमाणपत्र है। सुप्रीम कोर्ट की यह सख़्ती पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए एक चेतावनी है कि उसे तुष्टिकरण की राजनीति से ऊपर उठकर संविधान और लोकतंत्र की रक्षा करनी चाहिए। इतिहास गवाह है कि जो सरकारें लोकतांत्रिक मूल्यों से समझौता करती हैं, उन्हें अंततः जनता और संस्थाएं दोनों अस्वीकार कर देती हैं। सुप्रीम कोर्ट का बंगाल में ऑब्ज़र्वरों को बदलने का निर्देश इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है। ऑब्ज़र्वर चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता के प्रतीक हैं। जब अदालत उन्हें बदलने का आदेश देती है, तो इसका अर्थ होता है कि मौजूदा शासन व्यवस्था पर भरोसा नहीं रह गया है। यह फैसला प्रशासनिक तंत्र पर अविश्वास का सार्वजनिक संकेत है और राज्य सरकार के लिए एक बड़ा झटका भी है।
लोकतंत्र की बुनियाद पर प्रहार से ममता सरकार पर अंकुश
लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता, बल्कि उन संस्थाओं से चलता है जो चुनाव को संभव बनाती हैं। यदि अधिकारी राजनीतिक दबाव में काम करें, तो उनकी निष्पक्षता समाप्त हो जाती है। पश्चिम बंगाल में यही हो रहा है, इसलिए सरकार पर ऐसे आरोप लंबे समय से लग रहे हैं। राज्य में निचले स्तर से लेकर शीर्ष तक प्रशासनिक फैसले राजनीति से प्रभावित हैं। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इसी संस्थागत क्षरण को रोकने का प्रयास माना जा रहा है। हमारे लोकतंत्र में न्यायपालिका को अंतिम प्रहरी माना गया है। जब किसी राज्य में कार्यपालिका अपने दायित्व से विचलित होती है, तब न्यायपालिका का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख़्त रुख यह साबित करता है कि संस्थागत संतुलन अभी भी जीवित है और लोकतंत्र को कमजोर करने वाली कोशिशों पर अंकुश लगाया जा सकता है।
तृणमूल सरकार ने जानबूझकर अवैध घुसपैठ को संरक्षण दिया
पश्चिम बंगाल में वर्षों से चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठते सवाल अब केवल राजनीतिक आरोप नहीं रह गए, बल्कि न्यायिक चिंता का विषय बन चुके हैं। अब यह पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अदालत के निर्देशों का अक्षरशः पालन करे। मतदाता सूची की निष्पक्षता सुनिश्चित करना और प्रशासनिक स्वतंत्रता बहाल करना केवल कानूनी मजबूरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक कर्तव्य है। यदि सरकार ने अब भी अपनी स्वार्थपरक कार्यशैली में बदलाव नहीं किया तो उस पर लग रहे आरोप और प्रगाढ़ होंगे। एसआईआर में रुकावट को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी ने यह साफ कर दिया है कि राज्य की सत्ताधारी राजनीति ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं की सीमाएं लांघी हैं। आरोप सही लग रहे हैं कि अवैध घुसपैठ और संदिग्ध मतदाता पंजीकरण को न केवल नजरअंदाज़ किया गया, बल्कि परोक्ष संरक्षण भी मिला, ताकि चुनावी गणित साधा जा सके।संवैधानिक सवाल को भी वोट बैंक के चश्मे से देखने पर चोट
सुनवाई के दौरान राजनीतिक बयानबाजी पर अदालत की नाराजगी यह बताती है कि संवैधानिक मंच को चुनावी मंच नहीं बनने दिया जाएगा। यह सीधे-सीधे उस राजनीतिक संस्कृति पर चोट है जिसमें हर संवैधानिक सवाल को भी वोट बैंक के चश्मे से देखा जाता है। सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती को यदि महज़ राजनीतिक असहमति समझा गया, तो यह भारी भूल होगी। यह पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए अंतिम चेतावनी है कि सत्ता संविधान से नहीं, संविधान सत्ता से बड़ा है। ममता बनर्जी के लिए यह क्षण आत्ममंथन का है। वह या तो वे लोकतांत्रिक मर्यादाओं की ओर लौटें, या फिर इतिहास उन्हें उस नेतृत्व के रूप में याद रखे जो सत्ता की ज़िद में संस्थाओं से टकरा गया। और इसके बाद जनता की अदालत में भी उसे करारी हार झेलनी पड़ी।
इससे पहले भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह साबित कर दिखाया था कि जब सत्ता खतरे में नजर आती है, तब वह संवैधानिक मर्यादाओं को भी ताक पर रखने से नहीं हिचकतीं। SIR जैसे प्रशासनिक और चुनावी सुधार को अनावश्यक रूप से NRC से जोड़कर उन्होंने इस मुद्दे को दिल्ली तक खींच लिया। जबकि कोर्ट भी SIR की प्रक्रिया को उचित ठहरा चुका है, फिर भी ममता बनर्जी अपनी जिद पर अड़ी हुई हैं। सवाल साफ है कि जब न्यायपालिका ने स्थिति स्पष्ट कर दी, तो फिर यह सियासी हंगामा क्यों? ममता बनर्जी को समझना होगा कि लोकतंत्र में संस्थाएं किसी व्यक्ति से बड़ी होती हैं। SIR जैसी प्रक्रिया पारदर्शिता के लिए है, न कि किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए। NRC का डर दिखाकर राजनीति करना अब पुराना हथकंडा हो चुका है। अब सवाल यह नहीं कि SIR से तुष्टिकरण की नीति के चलते तृणमूल कांग्रेस को नुकसान होगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करेंगी, या फिर हार के डर में उन्हें लगातार कमजोर करती रहेंगी। बंगाल की जनता सच देख रही है और यही सच आने वाले चुनावों में टीएमसी की असली परीक्षा लेगा।पश्चिम
बंगाल में SIR में 1.36 करोड़ संदिग्ध नाम काटे जाएंगे
सुप्रीम कोर्ट में आज (4फरवरी) पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सुनवाई हुई। इस दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद वकीलों के बीच मौजूद थी। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम. पंचोली की पीठ ने की। मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उन्हें पश्चिम बंगाल के अपने दो साथी न्यायाधीशों से जानकारी मिली, जिन्होंने पास प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया समझाई और इसी समझ के आधार पर इस मुद्दे को शामिल किया गया। मामले में सीएम ममता बनर्जी का पक्ष रखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने बताया कि न्यायालय ने पहले तार्किक विसंगतियों की सूची प्रदर्शित करने का निर्देश दिया था। उन्होंने कहा कि 32 लाख मतदाता सूचीबद्ध नहीं हैं, 1.36 करोड़ नाम तार्किक विसंगति सूची में हैं। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि न्यायालय को सूचित किया गया था कि सूची संचार का एकमात्र माध्यम नहीं है और संबंधित व्यक्तियों को व्यक्तिगत नोटिस भी जारी किए जा रहे हैं।
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को ‘व्हाट्सएप आयोग’ कहा
सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को ‘व्हाट्सएप आयोग’ कहा और कहा कि चुनाव आयोग व्हाट्सएप के माध्यम से अनौपचारिक आदेश जारी कर रहा था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस दौरान कहा कि चार राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, 24 साल बाद, तीन महीने में यह सब करने की क्या जल्दी थी? जब फसल कटाई का मौसम चल रहा है…जब लोग यात्रा कर रहे हैं…100 से अधिक लोग मारे गए! बीएलओ की मौत हो गई, कई लोग अस्पताल में भर्ती हैं। एसआईआर असम क्यों नहीं किया जा रहा है? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आगे कहा कि 58 लाख नाम काट दिए गए, उनके पास अपील करने का विकल्प नहीं था। केवल बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है – पश्चिम बंगाल के लोगों को कुचलने के लिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि शायद अधिकारियों की उपलब्धता के बाद सूक्ष्म पर्यवेक्षकों की आवश्यकता नहीं होगी। इस पर चुनाव आयोग से मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अपने अधिकारियों को भी बताएं कि वे संवेदनशील रहें और नोटिस जारी न करें।
NRC का डर दिखाकर वोट बैंक की खेती कर रही ममता बनर्जी
दरअसल, ममता बनर्जी की सबसे बड़ी समस्या यही रही है कि वे हर संवैधानिक प्रक्रिया को राजनीतिक नजरिए से देखती हैं। SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी बनाना है, ताकि घुसपैठ, फर्जी वोटिंग और डुप्लीकेट नामों पर रोक लग सके। लेकिन ममता बनर्जी ने इसे NRC का भय दिखाकर अल्पसंख्यक समुदाय को डराने का हथियार बना लिया। यह कोई नई रणनीति नहीं है कि डर पैदा करो, भावनाएं भड़काओ और फिर उसी आग पर राजनीतिक रोटियां सेंको। SIR को NRC से जोड़ना पूरी तरह भ्रामक और राजनीतिक चाल है। केंद्र सरकार बार-बार स्पष्ट कर चुकी है कि SIR का NRC से कोई लेना-देना नहीं है। इसके बावजूद ममता बनर्जी लगातार NRC का डर दिखा रही हैं। दरअसल, उन्हें पता है कि बंगाल में अवैध घुसपैठ और संदिग्ध वोटरों का बड़ा नेटवर्क वर्षों से टीएमसी की राजनीतिक रीढ़ बना हुआ है। अगर मतदाता सूची शुद्ध हो गई, तो यह नेटवर्क ढह सकता है—और यही डर उन्हें बेचैन कर रहा है।
घुसपैठ की जिम्मेदारी किसकी, जब खुद TMC पर FIR
ममता बनर्जी सवाल उठाती हैं कि “लोगों को नागरिकता साबित क्यों करनी पड़े?” लेकिन वे यह नहीं बतातीं कि राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठ किसके संरक्षण में फल-फूल रही है। सीमा की निगरानी केंद्र का विषय हो सकता है, लेकिन राज्य के भीतर बसाना, राशन कार्ड बनवाना, आधार से जोड़ना और वोटर लिस्ट में नाम चढ़वाना—यह सब राज्य सरकार की नाक के नीचे होता है। अगर बंगाल में घुसपैठ है, तो उसकी पहली जिम्मेदार खुद ममता सरकार है। विडंबना यह है कि बीएलओ को उकसाने के मामले में खुद टीएमसी नेताओं पर एफआईआर दर्ज हो चुकी है। यानी जिस प्रक्रिया को ममता बनर्जी “जनविरोधी” बता रही हैं, उसी में उनकी पार्टी के लोग कानून तोड़ते पकड़े गए हैं। इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि यह पूरा आंदोलन जनहित नहीं, बल्कि सत्ता बचाने की कवायद है?संवैधानिक
संस्थाओं पर हमले, हिंसा और अराजकता की राजनीति
यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं से टकराई हों। चुनाव आयोग, सीबीआई, ईडी और अब बीएलओ—हर संस्था उन्हें तब “पक्षपाती” लगने लगती है जब वह कानून के मुताबिक काम करती है। याद कीजिए, ईडी की कार्रवाई के दौरान कैसे वे ग्रीन फाइल लेकर भागती नजर आई थीं। यह वही मुख्यमंत्री हैं जो खुद को लोकतंत्र की रक्षक बताती हैं, लेकिन व्यवहार में हर जांच एजेंसी को दुश्मन घोषित कर देती हैं।
पश्चिम बंगाल में चुनाव मतलब हिंसा—यह पहचान ममता शासन में ही बनी। पंचायत चुनाव हों या विधानसभा चुनाव, बूथ कैप्चरिंग, धमकी और खून-खराबा आम बात हो गई है। अब जब SIR जैसी प्रक्रिया से निष्पक्ष चुनाव की संभावना बढ़ी है, तो स्वाभाविक है कि टीएमसी घबरा गई है। क्योंकि निष्पक्ष चुनाव उनके लिए सबसे बड़ा खतरा है।
हार की आहट और बौखलाहट, जनभावनाओं से खिलवाड़
आसन्न विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी की भाषा और तेवर बता रहे हैं कि वे अंदर से डरी हुई हैं। जनता महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था से त्रस्त है। संदेशखाली से लेकर शिक्षक भर्ती घोटाले तक, टीएमसी सरकार की साख बुरी तरह गिरी है। ऐसे में SIR जैसी पारदर्शी प्रक्रिया उनके लिए खतरे की घंटी है। ममता बनर्जी बार-बार अल्पसंख्यकों को यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि केंद्र सरकार उनके अधिकार छीन लेगी। यह सीधा-सीधा सामाजिक विभाजन की राजनीति है। मुख्यमंत्री पद पर बैठी नेता से ऐसी गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी की उम्मीद नहीं की जाती। लोकतंत्र डर से नहीं, भरोसे से चलता है और ममता बनर्जी उस भरोसे को तोड़ रही हैं।
संविधान बनाम सत्ता, बंगाल को बंधक बनाती राजनीति
आज असली लड़ाई SIR या NRC की नहीं है, बल्कि संविधान और सत्ता के बीच है। ममता बनर्जी खुद को संविधान का रक्षक दिखाती हैं, लेकिन व्यवहार में वे उसी संविधान के तहत बनी संस्थाओं को चुनौती दे रही हैं। कोर्ट के फैसले को नजरअंदाज करना, चुनाव आयोग पर सवाल उठाना और प्रशासनिक अधिकारियों को भड़काना, यह सब संवैधानिक अराजकता की ओर इशारा करता है। दुखद यह है कि ममता बनर्जी अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक लड़ाई में पूरे पश्चिम बंगाल को बंधक बना रही हैं। विकास ठप है, उद्योग पलायन कर चुके हैं और युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर भाग रहे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री को सिर्फ वोट बैंक और कुर्सी की चिंता है।पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ी बाधा कभी मुस्लिम वोट बैंक नहीं रहा, बल्कि उसका एकतरफा ध्रुवीकरण रहा है। जब तक यह वोट बैंक पूरी तरह तृणमूल कांग्रेस के साथ खड़ा था, तब तक मुकाबला असमान था। लेकिन जैसे ही इस ध्रुवीकरण में दरार पड़ती दिख रही हैं, भाजपा के लिए दूसरे राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक स्पेस अपने-आप खुलने लगा है। आज बंगाल में वही स्थिति बनती दिख रही है, जहां भाजपा को जीत के लिए मुस्लिम वोटों की जरूरत नहीं, बल्कि ममता के वोट बैंक के बिखरने की दरकार है। राजनीति का सच यही है कि हर बार जीतने के लिए सबसे ज्यादा वोट पाना जरूरी नहीं होता, कई बार विरोधी के वोट का कटना ही अहम बन जाता है। नौशाद सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी इसी भूमिका में सामने आ रही हैं।
इसके अलावा असदुद्दीन औवेसी भी अलग दम भर रहे हैं। ये दल भले ही सत्ता के दावेदार न हों, लेकिन मुस्लिम बहुल सीटों पर टीएमसी के परंपरागत वोटों में सेंध लगाकर भाजपा के लिए जीत का रास्ता आसान करने में पूरी तरह सक्षम हैं।आज पश्चिम बंगाल की सीएम बनर्जी की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है, जहां सत्ता का संतुलन नहीं, बल्कि सत्ता की असहायता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। उनकी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठती वह बेलगाम आवाज़ें हैं, जो सरकार की साख, संवैधानिक मर्यादा और कानून-व्यवस्था तीनों को एक साथ चुनौती दे रही हैं। एक के बाद एक टीएमसी नेताओं के विवादित कदम यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी पर नियंत्रण खो चुकी हैं? क्या इस बार के विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए भारी मुश्किलों को सबब बनने जा रहे हैं? पश्चिम बंगाल में छात्राओं और महिलाओं के यौन शोषण के मामले में पहले ही टीएमसी नेताओं के नाम आ चुके हैं। पिछले महीने टीएमसी के विधायक रहे हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की राजनीति में बड़ा बवाल कर दिया। अब फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।



