
संवाददाता
नई दिल्ली। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज मुकुंद नरवणे की प्रस्तावित किताब इन दिनों चर्चा में है. इसे लेकर कई तरह के विवाद सामने आए हैं. इसे छापने का अधिकार रखने वाले पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने स्पष्ट किया है कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है और लीक हुई प्रतियां कॉपीराइट का उल्लंघन हैं. राहुल गांधी लगातार उसी किताब को दिखा रहे हैं और उसके कुछ भी सार्वजनिक किए हैं.सड़क से लेकर संसद तक यह मसला उठा है. विपक्ष के नेता राहुल गांधी, अखिलेश यादव ने जहां इस मसले पर संसद के अंदर सरकार को घेर है तो विपक्ष के बाकी नेताओं ने भी बयानबाजी की है.
पूर्व थल सेनाध्यक्ष नरवने की प्रस्तावित किताब से जुड़े कुछ अंश मीडिया में सामने आने के बाद यही सवाल फिर से चर्चा में आ गया कि किताब छपने से पहले उसके अंश सार्वजनिक करना कहां तक उचित है? अगर यह गैरकानूनी है तो इसमें क्या सजा हो सकती है?
ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत 14 साल तक की सजा
भारत में आम नागरिक के लिए किताब छपने से पहले उसके अंश साझा करना सामान्यतः अपराध नहीं है लेकिन यह स्थिति बदल जाती है जब लेखक वर्तमान या पूर्व सरकारी अधिकारी हो. सामग्री राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा या विदेश नीति से जुड़ी हो. जानकारी गोपनीय श्रेणी में आती हो. ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 के मुताबिक यदि किसी किताब या लेख में ऐसी जानकारी हो जो सेना की तैनाती, सैन्य रणनीति, खुफिया सूचनाएं एवं संवेदनशील सीमा विवाद से संबंधित हो और वह पहले से सार्वजनिक न हो, तो ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 लागू हो सकता है. इसमें तीन वर्ष से 14 वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकता है. यह सजा तभी लागू होती है जब यह साबित हो कि जानकारी गोपनीय थी और उसका प्रकाशन बिना अनुमति किया गया.
कंटेन्ट लीक करने पर तीन साल तक की सजा और जुर्माना
ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के अलावा भी किताब के कंटेन्ट के लीक करने पर अलग से भी सजा का प्रावधान है. सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्वनी कुमार दुबे कहते हैं कि भारत में किसी किताब के प्रकाशन से पहले उसके कंटेंट को लीक करना कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत एक गंभीर अपराध है, जिसके लिए 6 महीने से 3 साल तक की जेल और 50 हजार से दो लाख तक का जुर्माना हो सकता है. अगर यह कंटेन्ट किसी तीसरे व्यक्ति ने लीक किया है तो किताब के लेखक या पब्लिशर सिविल कोर्ट में डैमेज का मुकदमा भी दायर कर सकते हैं.
सेवा नियम में भी दंड का प्रावधान
सेना, आईएएस, आईपीएस और अन्य उच्च सरकारी पदों पर कार्यरत या सेवानिवृत्त अधिकारियों पर सेवा नियम लागू रहते हैं. सेना के मामले में सेवानिवृत्ति के बाद भी रक्षा मंत्रालय की प्री पब्लिकेशन क्लियरेंस आवश्यक होती है. यदि बिना अनुमति किताब छापी जाए या किताब के अंश मीडिया को दिए जाएं तो इसके गंभीर परिणाम लेखक को भुगतने पड़ सकते हैं. पेंशन से संबंधित कार्रवाई, अनुशासनात्मक नोटिस, आधिकारिक चेतावनी दी जा सकती है. हालांकि यह आपराधिक सजा नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई होती.
पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने स्पष्ट किया है कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है और लीक हुई प्रतियां कॉपीराइट का उल्लंघन हैं.
मानहानि और देशहित का सवाल
यदि किताब के अंश सरकार की नीतियों, किसी संस्था या किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगाते हैं और वे प्रमाणित नहीं हैं, तो मानहानि का मामला भी बन सकता है. हालांकि भारत में मानहानि का कानून अपेक्षाकृत संयमित रूप में लागू किया जाता है.
नरवणे की किताब और हालिया विवाद
पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल नरवने की प्रस्तावित आत्मकथा से जुड़े कुछ अंश हाल के दिनों में सार्वजनिक हुए हैं. इन अंशों में कथित तौर पर यह उल्लेख बताया गया कि लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास चीनी सेना के टैंकों की गतिविधियों की सूचना मिलने के बाद भी तत्काल सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई. इन अंशों के सामने आने के बाद मीडिया में व्यापक चर्चा हुई. राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल उठे.
विपक्ष ने सरकार से जवाब मांगा. यह मामला संसद में भी उठा. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में इस मुद्दे का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि इस तरह की जानकारी सही है तो देश को सच जानने का अधिकार है. उन्होंने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि सीमा पर वास्तविक स्थिति क्या थी और उस समय निर्णय प्रक्रिया कैसी रही? समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी राहुल गांधी के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर पारदर्शिता जरूरी है. सरकार को जवाबदेह होना चाहिए. हालांकि सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में हर जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती.

सरकार और सेना का रुख
सरकारी सूत्रों और रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार सेना और सरकार के बीच निरंतर संवाद रहता है. कई बार रणनीतिक कारणों से चुप्पी साधी जाती है. हर सैन्य गतिविधि को तुरंत सार्वजनिक करना व्यवहारिक नहीं होता. यह भी कहा गया कि किताब के अंश आधिकारिक रूप से प्रकाशित होने से पहले उनके संदर्भ और व्याख्या अधूरी हो सकती है. इस मसले के संसद में उठने के साथ ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई मंत्रियों ने कहा कि जिस किताब के हवाले से नेता प्रतिपक्ष बातें कर रहे हैं, वह हैं कहां? उन्हें सदन के सामने रखना चाहिए.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा
यह पूरा मामला एक बार फिर उस संतुलन की याद दिलाता है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच बनाना पड़ता है. पूर्व सैन्य अधिकारी अपने अनुभव साझा करने के हकदार हैं लेकिन उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होता है कि कोई गोपनीय जानकारी उजागर न हो. देश-हित को नुकसान न पहुंचे.
क्या हर किताब पर रोक लगाई जा सकती है?
भारत में सैन्य संस्मरण, आत्मकथाएं, रणनीतिक विश्लेषण पहले भी प्रकाशित हुए हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि संवेदनशील हिस्सों की पूर्व जांच और अनुमति जरूरी होती है. यदि यह प्रक्रिया अपनाई जाए, तो न लेखक पर कार्रवाई होती है न ही सरकार पर सवाल उठते हैं.
पूर्व थलसेनाध्यक्ष नरवने की किताब से जुड़े अंशों को लेकर उठा विवाद केवल एक व्यक्ति या एक किताब तक सीमित नहीं है. यह बहस हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी की सीमा क्या हो? जनता को कितना जानने का अधिकार है? और पूर्व अधिकारियों की जिम्मेदारी कहां तक जाती है? कानून स्पष्ट है कि गोपनीय जानकारी को बिना अनुमति सार्वजनिक करना दंडनीय हो सकता है, लेकिन हर खुलासा अपराध नहीं होता. अंतिम निर्णय तथ्यों, संदर्भ और कानूनी समीक्षा पर निर्भर करता है. लोकतंत्र में सवाल उठना जरूरी है, लेकिन साथ ही यह भी उतना ही जरूरी है कि देश की सुरक्षा और संस्थाओं की गरिमा बनी रहे.



