
संवाददाता
नई दिल्ली। महिला सशक्तिकरण की दिशा में दिन ब दिन नए-नए बदलाव देखने को मिल रहे हैं. करीब दो साल पहले केंद्र सरकार द्वारा संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए पारित किए गए नारी शक्ति वंदन अधिनियम के बाद लगातार महिलाओं को उन संस्थाओं में भी रिजर्वेशन मिल रहा है जहां अभी तक नहीं था. अब एक ऐसी वैधानिक संस्था में महिलाओं को 65 साल बाद रिजर्वेशन मिला है जहां वह अपनी बात को बुलंदी से रख सकेंगी. हम बात कर रहे देश की राजधानी दिल्ली में स्थित बार काउंसिल ऑफ दिल्ली की.
बार काउंसिल ऑफ दिल्ली (बीसीडी) देश की सबसे बड़ी बार काउंसिल है, यहां दिसंबर 2025 तक एक लाख 65 हजार से ज्यादा वकील रजिस्टर्ड हो चुके हैं. बीसीडी चुनाव के लिए 20, 21 और 22 फरवरी को मतदान होगा. इसके अलावा भी कुछ नए वकीलों का भी रजिस्ट्रेशन हुआ है. 1961 में बनी बीसीडी में 25 सदस्य होते हैं. लेकिन, इन 25 सदस्य पदों में से अभी तक एक भी पद महिला वकीलों के लिए आरक्षित नहीं था. लेकिन, इस बार होने वाले बीसीडी के चुनाव में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पांच पद महिलाओं के लिए रिजर्व किए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इसको रिजर्वेशन नहीं बल्कि वुमन रिप्रिजेंटेशन देना कहा है. इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी पिछले साल संपन्न हुए दिल्ली के सभी बार एसोसिएशन के चुनाव में भी महिला वकीलों का 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हुए कई पदों को महिलाओं के लिए रिजर्व किया था. अब बीसीडी में भी पांच पद आरक्षित होने के बाद महिला एडवोकेट मजबूती के साथ चुनाव मैदान में ताल ठोक रही हैं. इन महिला वकीलों से ईटीवी भारत ने विशेष बातचीत की.
बीसीडी में महिला वकीलों की आवाज को करेंगे बुलंद: ज्योति सिंह
अपने हाथ में चुनाव प्रचार का पंपलेट लेकर कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर के चैंबरों में वोट मांग रहीं बीसीडी सदस्य पद की प्रत्याशी ज्योति सिंह ने कहा कि यह हमारे लिए बहुत ही सम्मान की बात है कि इस बार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हमें अलग से रिप्रिजेंटेशन का मौका मिला है. उन्होंने कहा कि बीसीडी सदस्य निर्वाचित होने पर महिलाओं की आवाज को बीसीडी में बुलंद किया जाएगा. उन्होंने बताया कि वह मौजूदा समय में शाहदरा बार एसोसिएशन की कोषाध्यक्ष भी हैं. पिछले साल ही उन्हें इस पद पर चुनाव लड़ने पर जीत मिली थी.
उन्होंने कहा कि जिस विश्वास और जिम्मेदारी के साथ मुझे शाहदरा बार एसोसिएशन में वकील साथियों ने जिताकर भेजा उस विश्वास को बीसीडी में जीत होने पर भी बना कर रखूंगी. शाहदरा बार के एक-एक पैसे के खर्च का हिसाब जिस तरह से मैं यहां दे रही हूं, उसी तरीके से बीसीडी में भी पूरी पारदर्शिता के साथ काम करने का मेरा वायदा है.
महिला वकीलों में भी विकसित होगी लीडरशिप
ज्योति सिंह ने कहा कि इससे पहले भी कई महिलाओं ने बीसीडी सदस्य का चुनाव लड़ा है. लेकिन, कहीं न कहीं पुरुषों को ही वरीयता मिली और वह चुनाव नहीं जीत सकीं. इसलिए अब जब हमारा प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की पहल कोर्ट की तरफ से हुई है तो यह हमारे लिए एक बड़ा मौका है, जिससे महिला वकीलों में भी लीडरशिप विकसित होगी. महिलाएं वैसे तो किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं. बीसीडी में एक महिला प्रतिनिधित्व की कमी महसूस होती थी जो अब नहीं रहेगी. उन्होंने बताया कि अगर मैं चुनाव जीतती हूं तो फेक वकीलों का रजिस्ट्रेशन पूरी तरह बंद कराऊंगी. लोगों ने सिर्फ नाम का वकील बनने के चक्कर में यहां बहुत भीड़ बढ़ा रखी है, जिससे वास्तविक और मेहनती वकीलों का नुकसान हो रहा है. मेरा प्रयास रहेगा कि जो प्रैक्टिसिंग वकील नहीं हैं उनका रजिस्ट्रेशन बिना वेरिफिकेशन के बिल्कुल नहीं हो. इस तरह से इस प्रोफेशन में पारदर्शिता लाने का मेरा प्रयास रहेगा.
जौहर करने से नहीं झांसी की रानी बनने से मिलता है अधिकारः कीर्ति मदान
महिला वकीलों की मुखर और प्रखर आवाज के रूप में बीसीडी सदस्य पद का चुनाव लड़ रहीं एडवोकेट कीर्ति मदान ने ईटीवी भारत के साथ विशेष बातचीत में कहा कि जब महिला वकीलों ने बीसीडी में अपने प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए आवाज उठाई तो हमें हमारा हक मिल गया. अगर यह आवाज पहले उठाई गई होती तो यह हक पहले भी मिल सकता था. मेरा मानना है कि अब जौहर करने का जमाना नहीं है झांसी की रानी बनने का जमाना है. मैं महिलाओं से यही कहना चाहती हूं कि जौहर नहीं झांसी की रानी बनो. सुप्रीम कोर्ट ने हमें रिजर्वेशन नहीं बल्कि रिप्रिजेंटेशन की बात कहते हुए बीसीडी में पांच पद महिलाओं को दिए हैं. यह ऐतिहासिक है और हम महिला वकीलों की सुरक्षा सहित तमाम मुद्दों के साथ चुनाव मैदान में डटे हैं. आज भी हमारे लिए सबसे बड़ा मुद्दा महिला सुरक्षा ही है.
उन्होंने कहा कि हर महिला चाहती है कि मैं समय से अपना काम खत्म करके घर सुरक्षित पहुंच सकूं. हम इस दिशा में प्रयास करेंगे. इसके साथ ही जो नए बच्चे वकालत के पेशे में आते हैं उनको बहुत सफर करना पड़ता है. उनके लिए खर्च चलाने के लिए स्टाइपेंड की व्यवस्था कराने का प्रयास रहेगा. इसके साथ ही मेरा एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि जिस तरह से एमबीबीएस का स्टूडेंट पढ़ाई पूरी करके जूनियर रेजिडेंट के तौर पर किसी अस्पताल में ज्वाइन करता है तो उनके रहने की व्यवस्था अस्पताल के अंदर ही सरकारी क्वार्टर में की जाती है.
इसी तरह वकालत के पेशे में आने वाले बिल्कुल नए स्टूडेंट के लिए भी ऐसी ही व्यवस्था होनी चाहिए ताकि उनके ऊपर अपने रहने का खर्च चलाने का बोझ न पड़े. इसके अलावा नए वकीलों को कोर्ट का काम करने और सीखने के लिए कई ऑनलाइन सॉफ्टवेयर महंगे परचेज करने पड़ते हैं वह चीजें उनके लिए फ्री होनी चाहिए. यह सब हमारे मुद्दे हैं. चुनाव जीतने पर उनको हल कराने का प्रयास रहेगा.



