
विनीत “नादान”
अक्सर ही हम राजनीति शब्द सुनते आ रहे हैं लेकिन आखिर इस शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है? राजनीति का मूल रूप से मतलब शासन करने की कला या नीति है। यह शब्द दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है – राज (शासन या राज्य) + नीति (उचित समय और स्थान पर सही कार्य करने की कला या नियम)।इसलिए, राजनीति का अर्थ है: नीति विशेष के द्वारा शासन करना, राज्य चलाना या किसी विशेष उद्देश्य को प्राप्त करना। सरल शब्दों में, यह समाज या राज्य में सत्ता, संसाधनों का बंटवारा, निर्णय लेना और लोगों के हितों को संतुलित करने की प्रक्रिया है।
यदि आधुनिक संदर्भ में बात करें तो राजनीति वह प्रक्रिया है जिसमें कुछ दल, समूह या व्यक्ति सत्ता प्राप्त करने, उपयोग करने और नीतियाँ बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं जो एक प्रक्रिया द्वारा सरकार चुनने एवं उन सरकारों द्वारा जनहित में कानून बनाने और सार्वजनिक मामलों से जुड़ी होती है।राजनीति न केवल सरकार तक सीमित है, बल्कि सत्ता प्राप्ति एवं स्वार्थ सिद्धि की लड़ाई में भी राजनीति का प्रभाव आजकल स्पष्ट देखने को मिलता है। वैसे तो यह लोकतंत्र, चुनाव और जनसेवा से जुड़ी हुई है, लेकिन अक्सर ही इसे नकारात्मक अर्थ में (जैसे छल-कपट या स्वार्थ) भी इस्तेमाल किया जाता है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राजनीति समाज को व्यवस्थित और निर्देशित करने से ज्यादा राजनीतिक दलों द्वारा स्वार्थ सिद्धि एवं येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने या उस पर पकड़ बनाए रखने का साधन होकर रह गयी है। वर्ष 2016 में विदाई से पहले समाजवादी पार्टी द्वारा एक विशेष समुदाय तथा उससे जुड़े वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए पारित कराया गया “मदरसा शिक्षक सुरक्षा बिल” इसी की बानगी भर है जिसे वर्तमान प्रदेश सरकार ने वापस ले लिया है।
यहां यह भी विचारणीय है कि आखिर इस बिल को वापस लेने में प्रदेश सरकार को लगभग सात वर्ष क्यों लग गये जबकि पहले दिन से ही मालूम हो जाना चाहिए था कि यह पूरी तरह असंवैधानिक है।इस बिल में मदरसों को असीमित अधिकार प्राप्त थे जिसके अंतर्गत किसी भी मदरसा शिक्षक या कर्मचारी के खिलाफ न तो जांच हो सकती थी और ना ही कोई पुलिस एक्शन हो सकता था। इतना ही नहीं, वेतन देने में देरी होने पर संबंधित अधिकारियों को सजा का भी प्रावधान था। इसमें मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों को वेतन भुगतान की व्यवस्था के साथ-साथ कुछ ऐसे प्रावधान थे, जिनके कारण मदरसों में प्रशासनिक जांच या कानूनी कार्रवाई में बाधाएं आती थीं एवं आश्चर्यजनक रूप से इन प्रावधानों को संवैधानिक दायरे से भी बाहर माना गया था। दोनों सदनों से पास इस विधेयक को तत्कालीन राज्यपाल ने आपत्ति जताते हुए राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेजा था तथा राष्ट्रपति ने भी इसे वापस लौटा दिया था। संविधान के जानकारों के अनुसार यह विधेयक जिसके तहत मदरसों को असीमित शक्तियां दे दी गई थी संविधान को दरकिनार कर ही बनाया गया था जिसका उद्देश्य केवल एक वर्ग विशेष को संतुष्ट करना, स्वार्थ सिद्धि के लिए अपने साथ जोड़े रखने या दूसरे शब्दों में कहें तो राजनीतिक तुष्टीकरण की ही था।
किसी एक पार्टी के विषय में तो मान लेते हैं कि यह बिल उनकी सत्ता से जुड़ा रहने की सोच के चलते लाया गया था लेकिन देश की किसी अन्य पार्टी या उनके नेताओं ने जो बार-बार संविधान की दुहाई देते हैं, या संविधान की प्रति हाथ में लेकर घूमते हैं, संविधान के ठेकेदार बनते हैं, इसके असवैधानिक होने पर कोई प्रश्न नहीं उठाया। मंतव्य स्पष्ट था – तुष्टीकरण की बहती गंगा में हाथ धोना क्योंकि उनकी नजर भी उस वोट बैंक से आगे देखना नहीं चाहती थी जिसके लिए तत्कालीन समाजवादी पार्टी ने इस बिल को पारित कराया था। राजनीति की रेल अब जनहित मार्ग से भटक कर स्वार्थ सिद्धि मार्ग पर तीव्र गति से अग्रसर है जिसका देशहित या समाज हितों से टकराकर पटरी से उतर जाने के खतरे को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता।
( लेखक कवि और पत्रकार हैं )



